Tuesday, April 22, 2014

Tally in Hindi

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टैली परिचय
    टैली एक ऐसा एकाउटिंग सॉफ्टवेयर है जो कि व्यावसायिक एकाउण्टिंग की समस्‍त आवश्‍यकताओं की पूर्ति करता है इस साफ्टवेयर को कर्नाटक प्रदेश की बंगलौर में स्थित एक कम्‍पनी M/S Penutronics Private Limited ने विकसित किया था टैली का पहला संस्‍करण टैली 4.0 बाजार में आया था , टैली का यह संस्‍करण ऑपरेटिंग सिस्‍टम डॉस में प्रयोग किया जा सकता था, इस संस्‍करण को प्रयोगकरने में इसके प्रयोगकर्त्‍ताओं को कुछ कमियां प्रतीत हुई तो कम्‍पनी ने इन कमियों को दूर करके उन्‍नत संस्‍करण टैली 4.5 बाजार में प्रस्‍तुत किया
    इसके बाद M/S Penutronics Private Limited ने टैली 5.0 बाजार में उतारा. यह संस्‍करण विण्‍डोज ऑपरेटिंग सिस्‍टम में चलाया जा सकता था टैली के प्रयोगकर्त्‍ताओं की बढती हुई जरूरतों को ध्‍यान में रखते हुए इसके निर्माताओं ने समय-समय पर नये संस्‍करण बाजार में प्रस्‍तुत कियेा आज टैली का नया संस्‍करण टैली 9 व टैली 9.0 ई.आर.पी. भी बाजार में उपलब्‍ध है एकाउण्‍टिंग की Process को सरल बनाने के लिए टैलीके निर्माताओं नें इसमें समय-समय पर परिवर्तन करके नये-नये संस्‍करणों को बाजार में उतारा है
टैली की विशेषतायें
    जैसा आप जानते हैं कि हमारे देश में सामान्‍य फाइनेंशियल एकाउण्टिंग से लेकर इन्वैंट्री कंट्रोल तक के लिए टैली नामक सॉफ्टवेयर का प्रयोग सबसे ज्‍यादा होता है। टैली सॉफ्टवेयर की निम्‍नलिखित विशेषतायें हैं –
सरलता – यह एकाउण्टिंग सॉफ्टवेयर बहुत ही सरल है और इसे बहुत ही कम समय में सीखा जा सकता है। इस सॉफ्टवेयर को प्रयोग करने से पहले आपको एकाउण्टिंग का ज्ञान होना आवश्‍यक है।
लचीलापन – टैली में लचीलापन से आशय है कि आप इसके अन्‍दर बनायी जाने वाली रिर्पोर्टों को अपनी आवश्‍यकतानुसार ढाल सकते हैं। आपका व्‍यापार चाहे जितना छोटाहो चाहे जितना बडा हो, टैली दोनों स्‍तरों पर खरा उतरता है और इसका लचीलापन इसे सरल बनाता है। जैसे –
·         टैली में आप अपने राज्‍य अर्थात् स्‍टेट के अनुसार वैट की गणना को कस्‍टमाइज कर सकते हैं।
·         टैली के अंतर्गत सेल और परचेज के अलग अलग वर्गों के अनुसार पहले से पूर्व निर्धारित सूची को जोडा गया है।
·         टैली में आप ञुटिरहित और ज्‍यादा तेजी से वाउचर एंट्री कर सकते है
·         टैली में आप प्रत्‍येक ट्रांजेक्‍शन पर अंतिम रिपोर्ट बनने पर अपनी नजर रख सकते हैं
·         टैली में आप बिल या इनवाइस की प्रिंटिंग टैक्‍स इनवाइस के रूप में भी कर सकते हैं।
·         टैली में दी गई एक ऐसी विशेष सुविधा है, जिसके द्वारा आप MS word, MS Excel, Foxpro, Oracal जैसे सॉफ्टवेयर में स्थित डाटा को टैली में प्रयोग करके आपनी रिपोर्ट में शामिल कर सकते है।
·         टैली में आप वैट कम्‍प्‍यूटेशन रिपोर्ट भी बना सकते है।
·         टैली में अब FTP सुबिधा जुडी हुई है जिसकी वजह से रिपोर्ट अपने आप ही वेब पेज फॉर्मेट में बदल जाती है।

इस तरह से आप यह समझ गए होंगे कि टैली अपने अंतर्गत किन विशेषताओं को समेटे हुए है। आइये अब टैली का अध्‍ययन चरणबध्‍द ढंग से करें ताकि आप इसके प्रयोग में महारत हासिल कर सकें।
 
( नोट- टैली के प्रयोग को सीखने से पहले नये प्रयोगकर्त्‍ताओं के लिये जो अभी तक एकाउण्टिंग के क्षेञ से पूरी तरह से अपरिचित है, के लिए यह बहुत जरूरी है कि वे एकाउ‍ण्टिंग के सभी तकनीकी शब्‍दों के अर्थों को समझें, ताकि विषय को समझने में कोई परेशानी न हो। जो लोग कॉमर्स के छाञ नहीं हैं उनके लिये यह बहुत जरूरी है कि वे टैली के प्रयोग को सीखने से पहले निम्‍न टॉपिक्‍स को ध्‍यान से पढे।)
एकाउण्टिंग परिचय
टैली कम्‍प्‍यूटर से एकाउण्टिंग में सम्‍पूर्ण सुविधा से लैस एप्‍लीकेशन सॉफ्टवेयर है। इस सॉफ्टवेयर में आपको पहले केवल डेटा एंट्री ही करनी होती है। शेष काम यह खुद करता है। वैसे तो एकाउण्टिंग एक जटिल प्रक्रिया है और इसे केवल कुछ खास लोग ही कर सकते हैं। टैली ने इस धारणा को गलत सिध्‍द किया है और कोई भी ऐसा व्‍यक्ति जिसे केवल एकाउण्टिंग के बुनियादी तत्‍वोंका ज्ञान हो वह टैली के द्वारा बिना किसी बाधा के बैलेन्‍स शीट तक बना सकता है।
एकाउण्टिंग व्‍यापार की भाषा है। प्रत्‍येक भाषा मूलतः संचार के साधन के रूप में कार्य करती है। एकाउण्टिंग के द्वारा भी यही कार्य किया जाता हैएकाउण्टिंग द्वारा व्‍यापार में हित रखने वाले विभिन्‍न पार्टी जैसे व्‍यापार का स्‍वामी, क्रेडिटर्स, इंवेस्‍टर्स, गवर्नमेंट और अन्‍य एजेंसीज व्‍यापारिक क्रिया-कलापों के परिणामों से परिचित होते हैं। सामान्‍यतया एकाउण्टिंग का सम्‍बन्‍ध व्‍यापार से है, तथपि ऐसी बात नहीं है कि एकाउण्टिंग का प्रयोग व्‍यापार होता है।गृहिणियो, सरकारएवं अन्‍य व्‍यक्तियों द्वारा भी एकाउण्टिंग का प्रयोग किया जाता है।
उदाहरण के लिए, एक गृहिणी को परिवार चलानेके लिए किसी समय विशेष में प्राप्‍त की गई धनराशि तथा किए गए खर्चों का उचित हिसाव रखना पडता है। वह प्राप्‍त धन का हिसाव हाउस होल्‍ड डायरी के किसी एक पेज पर लिख सकती है जबकि खाघ पदार्थ, दूध, कपडा,शिक्षा का व्‍यय, घर का किराया आदि जैसी विभिन्‍न खातों के सम्‍बन्‍ध में किए गए भुगतानों का तिथिवार ब्‍यौरा अपनी डायरी के किसी अन्‍य पृष्‍ठों पर लिख सकती है। इस प्रकार ब्‍यौरे से उसके लिए जानना सरल हो जायगा कि
·         नकदी किन स्‍ञोतों से प्राप्‍त हुई तथा प्राप्‍त धनराशि किन-किन खातों पर व्‍यय की गई?
·         समय-विशेष में प्राप्तियां ज्‍यादा रहीं या भुगतान?
·        किस समय विशेष के अंत में कैश बैलेन्‍स क्‍या था?
·        अधिक व्‍यय होने के कारण कोई घाटा तो नहीं हुआ?

एकाउण्टिंग का अर्थ (Meaning of Accounting)
 
        प्रारंभ में व्‍यावसायिक फर्म में एकाउण्टिंग का मुख्‍य उद्देश्‍य केवल व्‍यापार का किसी विशेष समय या वर्ष का लाभ-हानि ज्ञात करना व किसी एक विशेष तिथि को उस व्‍यापार की वित्‍तीय स्थिति ज्ञात करना ही था। परन्‍तु जैसे-जैसे व्‍यापार का आकार बढता गया, व्‍यापार के स्‍वामी या प्रबंधकों को अन्‍य कई प्रश्‍नों के उत्‍तर जानने की जरूरत हुईः जैसे उनके द्वारा निर्मित वस्‍तुओंकी क्‍या लागत आ रही है, वह ठीक है या अधिक? और क्‍या वह कम हो सकती है? इसी प्रकार व्‍यापार के प्रबंधक को व्‍यापार चलाने में भिन्‍न-भिन्‍न अन्‍य महत्‍तवपूर्ण विषयों के बारे में भी निर्णय लेने के लिए ऐसी इन्‍फॉरमेशन की जरूरत पडी, जिनको प्राप्‍त करने के लिए एकाउण्टिंग में अनेक सुधार एवं बदलाव किए गए। अतः हम कह सकते हैं कि एकाउण्टिंग इज ए बिजनेस लैंग्‍वेज
एकाउण्टिंग शब्‍दावली Accounting Terminology
कुछ आधारभूत एकाउण्टिंग शब्‍दों को समझना आवश्‍यक होता है, क्‍योंकि सामान्‍यतया इनका प्रयोग बहुत किया जाता है। इन्‍ही शब्‍दों को एकाउण्टिंग शब्‍दावली कहते है
कैपिटल – जो धन व्‍यापार के स्‍वामी ने व्‍यापार में लगा रखा है, अर्थात् जो धन व्‍यापार द्वारा अपने स्‍वामी को देता है, पूंजी या कैपिटल कहलाता है। पूंजी को व्‍यापार का शुध्‍द मूल्‍य या शुध्‍द सम्‍पत्ति कहते हैं।
पूंजी = कुल सम्‍पत्तियां – देयता
लायबिलिटीज – जो राशि किसी फर्म द्वारा अन्‍य पक्षों को देनी है, उसे लायबिलिटीज कहते हैं। अन्‍य शब्‍दों में, फर्म को कुछ राशि सम्‍पत्तियां स्‍वामी के अतिरिक्‍त अन्‍य पक्षोंके द्वारा भी दी जाती हैं, जिसे फर्मकी लायबिलिटीज कहते हैं।
देयता = कुल सम्‍पत्तियां – पूंजी
लायबिलिटीज को निम्‍न दो भागों में वि‍भाजित किया जा सकता है –
1.   फिक्‍सड लाइबिलिटीजये वे दायित्‍व होते हैं जिनका भुगतान एक दीर्घ समय के बाद किया जाता है। जैसे – लॉगटर्म लोन्‍स, ऋण-पञ आदि।
2.   करेंट लाइबिलिटीज ये वे दायित्‍व होते हैं जिनका भुगतान निकट-भविष्‍य में ही (सामान्‍यतया एक वर्ष के अन्‍तर्गत) देय हो, जैसे- लेनदार, बैंक अधिविकर्ण, देय विपञ, अल्‍पकालीन ऋण आदि।
एसेट मूल्‍य के गुण से युक्‍त व्‍यापार की प्रत्‍येक वस्‍तु जिस पर व्‍यापारी का स्‍वामित्‍व होता है, सम्‍पत्ति कहलाती है। उदाहरणतया, जो धन एक फर्मको आपने देनदारों से लेना है तथा जो माल, नकदी, फर्नीचर, मशीन या भवन आदि उसके पास हैं उन्‍हें उस फर्म की सम्‍पत्ति कहते हैं।
1.   फिक्‍सड एसेट – ये ऐसी सम्‍पत्तियां होती हैं जो व्‍यापार को चलाने के उद्देश्‍य से परचेज की जाती हैं, न कि पुनः विक्रय के लिए। प्रमुख उदा‍हरण हैं – भूमि, भवन, मशीनरी, फर्नीचर, मोटरगाडी आदि।
2.   करेंट एसेट – ये व्‍यापार की वे सम्‍पत्तियां हैं जो पुनः बिक्री के लिए नकद में परिवर्तित करने के लिए अल्‍प समय के लिए रखी जाती हैं। इनके प्रमुख उदाहरण हैं बिना बिका हुआ माल, देनदार,विपञ, बैंक का शेष इत्‍यादी।
रिवेन्‍यू – व्‍यापारिक लेन-देनों के परिणामस्‍वरूप जो मद स्‍वामी की पूंजी में में वृध्दि करतीहै, उसे Revenue कहते हैं।
एक्‍सपेंसेस – उत्‍पाद या प्रोडक्‍ट की उत्‍पत्ति के लिए प्रयोग की गई वस्‍तुओं व सेवाओं की लागत को व्‍यय कहते हैं। व्‍यय के परिणामस्‍वरूप स्‍वामी की पूंजी में कमी होती हैं। किराया, कमीशन, ब्‍याज, मजदूरी, वेतन, भाडा आदि व्‍यय के उदाहरण हैं।
ट्रांजेक्‍शन – दो या दो से अधिक व्‍यक्तियों के बीच धनराशि, वस्‍तुओं या सेवाओं जिनका मूल्‍यांकन मुद्रा में किया जा सकता है, अदान-प्रदान या विनिमय-व्‍यावहार या लेन-देन ट्रांजेक्‍शन कहलाता है
एकाउंट – किसी व्‍यक्ति, सम्‍पत्ति या आय-व्‍यय से सम्‍बन्धित समस्‍त व्‍यवहारों को एक स्‍थान पर लिखने के उद्देश्‍य से उस व्‍यक्ति, सम्‍पत्ति, आय तथा व्‍यय का अलग लेजर स्‍केल दिया जाता है, जिसमें उससे सम्‍बन्धित समस्‍त व्‍यवहार लिखे जाते हैं, उस व्‍यक्ति का एकाउंट कहलाता है।
बुक्‍स ऑफ एकाउंट – जिन बहियों, पुस्‍तकों या रजिस्‍टरों में विभिन्‍न व्‍यापारिक व्‍यावहारों का लेखा किया जाता है, वे लेखा-पुस्‍तकें या बहियां या बुक्‍स ऑफ एकाउंट कहलाती है।
एंट्री – किसी व्‍यवहार को हिसाब की पुस्‍तकों में लिखना एंट्री करना कहलाता है
डेबिट – खाते के दो पक्ष होते हैं – नाम तथा जमा किसी खाते के नाम या डेबिट पक्ष में किसी व्‍यवहार की एंट्री की जाती है तो इसे उस खाते का डेबिट कहते हैं
क्रेडिट – किसी खाते के जमा पक्ष में प्रविष्‍ट करना क्रेडिट करना कहलाता है।
परचेज – परचेज शब्‍द का प्रयोग केवल माल के खरीदने के लिए होता है।
सेल्‍स – विक्रय शब्‍द का प्रयोग केवल माल के बेचने के लिए किया जाता है। अब माल को नकद बेचाजाता है तो उसे कैश सेल्‍स कहते हैं, किन्‍तु माल उधार बेचा जाता हैं, तो उसे क्र‍ेडिट सेल्‍स कहते हैं।
स्‍टॉक – स्‍टॉक शब्‍द का आशय उस माल से है जो किसी विशेष्‍ तिथि को बिना बिका रह जाता है। स्‍टॉक का मूल्‍यांकन करने के लिए, गोदाम में रखे हुए बिना बिके माल की पूरी लिस्‍ट तैयार की जाती है और माल की माञा के साथ साथ उसका मूल्‍य भी लिखा जाता है। स्‍टॉक का मूल्‍यांकन लागत मूल्‍य अथवा बाजार मूल्‍य में जो भी कम है, उस पर कियाजाता है। स्‍टॉक दो प्रकार का होता है – प्रारंभिक स्‍टॉक तथा अंतिम स्‍टॉक।
डेब्‍टरवह व्‍यक्ति है, जिससे व्‍यापारी को रूपया देना है। इसे देनदार भी कहते हैं।
क्रेडिटर – वह व्‍यक्ति है, जिसे व्‍यापारी से रूपया लेना है। इसे लेनदार भी कहते हैं।